मवई का देसी कल्चर (मंडला डिंडोरी बालाघाट)
"मवई का देसी कल्चर – मिट्टी की खुशबू, दिलों का अपनापन"
मवई गांव की बात ही कुछ और है। यहां का रहन-सहन, पहनावा, खाना-पीना – सब कुछ देसी ठाठ वाला है। लोग सुबह-सुबह उठते हैं, कुएं या हैंडपंप से पानी भरते हैं, नदिया में नहाते हैं, फिर खेत-खलिहान के काम में लग जाते हैं।
मर्द धोती-कुर्ता या गमछा डालते हैं, औरतें लुगरा पहनती हैं। चूल्हे पर रोटी बनती है, सरसों का साग या देसी भरता, और दाल-भात से पेट नहीं – दिल भरता है।
त्योहारों में मवई की रौनक देखो – भगोरिया, मड़ईया, दशहरा, दीपावली हो या होली – सब मिलजुल कर मनाते हैं। लोकगीत गूंजते हैं, नाच-गाना होता है, और गांव जगमगाता है।
यहां लोग दिल से जीते हैं। कोई भूखा नहीं रहता, चाहे अपना हो या मेहमान। बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सबमें संस्कृति बसी है। शहरी चमक-दमक तो बहुत देखी, लेकिन मवई जैसी आत्मीयता कहीं नहीं।
मवई सिर्फ एक गांव नहीं, ये एक एहसास है – देसीपन और अपनापन का।

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