बड़ादेव मवई मेला जो सदियों से आदिवासी कल्चर को दर्शाता है


मवई मेला बैगा जनजाति और आदिवासी संस्कृति को प्रदर्शित करने वाला एक महत्वपूर्ण आयोजन है। यह मेला मध्य प्रदेश के वनांचल क्षेत्र मवई, जो कि कान्हा नेशनल पार्क के पास स्थित है, में आयोजित होता है। इस मेले में स्थानीय आदिवासी समुदायों की परंपराएं, रीति-रिवाज, नृत्य, संगीत, हस्तशिल्प और पारंपरिक खानपान देखने को मिलता है।

मवई मेले की विशेषताएँ

1. बैगा जनजाति की झलक – बैगा समुदाय अपनी पारंपरिक वेशभूषा, लोक नृत्य और रीति-रिवाजों के साथ मेले में विशेष रूप से भाग लेता है।


2. पशु मेला – इस मेले में पशु व्यापार भी होता है, जहाँ स्थानीय लोग मवेशी खरीदने-बेचने आते हैं।


3. विदेशी पर्यटक – चूँकि मवई, कान्हा नेशनल पार्क के पास स्थित है, इसलिए यहाँ विदेशी पर्यटक भी बड़ी संख्या में आते हैं।


4. स्थानीय हाट-बाजार – मेले में आदिवासी हस्तशिल्प, बांस से बनी चीजें, लकड़ी की नक्काशी, और पारंपरिक गहनों की दुकानें भी लगती हैं।


5. रीना सेला और वनांचल मवई की यात्रा – आसपास के गाँवों और इलाकों से भी लोग इस मेले में बड़ी संख्या में आते हैं, जिससे यहाँ की संस्कृति को करीब से देखने और समझने का अवसर मिलता है।
हाँ, छत्तीसगढ़ (CG) मवई के पास में है, और इसका प्रभाव मवई के सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन पर भी देखने को मिलता है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों राज्यों में बैगा जनजाति और अन्य आदिवासी समुदाय रहते हैं, जिनकी परंपराएं, लोकनृत्य, संगीत और रीति-रिवाज काफी मिलते-जुलते हैं।

मवई मेले में छत्तीसगढ़ का प्रभाव

1. छत्तीसगढ़ के कलाकार और व्यापारी – मेले में छत्तीसगढ़ से भी लोक कलाकार, हस्तशिल्प व्यापारी और पारंपरिक व्यंजन बेचने वाले आते हैं।


2. सांस्कृतिक समानता – बैगा, गोंड और अन्य आदिवासी समुदायों की परंपराओं में काफी समानता है, इसलिए छत्तीसगढ़ के लोग भी इस मेले का हिस्सा बनते हैं।


3. यात्री और पर्यटक – चूँकि छत्तीसगढ़ से मवई की दूरी ज्यादा नहीं है, इसलिए वहाँ से भी पर्यटक और श्रद्धालु बड़ी संख्या में मेले में आते हैं।


4. लोकनृत्य और पारंपरिक गीत – मेले में छत्तीसगढ़ के पंथी नृत्य, सुआ नृत्य और करमा नृत्य जैसे पारंपरिक नृत्य भी देखने को मिल सकते हैं।

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